KUMBH KA MELA IN UJJAIN | सिंहस्थ कुंभ | अर्ध कुंभ | महा कुंभ – 2019-2027

कुंभ का मेला कब और कहाँ -कहाँ लगता है

kumbh ka mela bharat ka ek pavitr mela or tauhar mana jata h , दरअसल कुम्भ का मेला भारत में चार जगहों पर लगता है। नासिक , उज्जैन , हरिद्वार , इलाहाबाद , जिनमे से उज्जैन के कुम्भ का काफी महत्व है। दरअसल उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर कुम्भ का मेला लगता है। यह MP के दक्षिण में आता है। उज्जैन में अर्ध कुम्भ और महा कुम्भ का आयोजन भी होता है।प्रयागराज में 6 बर्ष में अर्ध कुंभ और 12 बर्ष में पूर्ण कुंभ का मेला लगता है।

 

KUMBH KE PECCHE KA ITHAS (कुंभ के पीछे की पौराणिक कथा )

 

एक बार देवता अपने आप को दानवो से कमजोर महसूस करते हैं। iske upay ke liy bh bharma ji k pas jate h or khte h ,कृपया आप हमें दानवो से शक्तिशाली होने का उपाय वताये।

tb bhrma ji khte h ki iske liy tmhe samudr manthan krna hoga .जिसके लिए तुम्हे दानवो की सहायता भी पड़ेगी। usse tmhe amrat prapt hoga jisse tm amr ho jaoge .

KUMBH KA MELA IN UJJAIN | सिंहस्थ कुंभ | अर्ध कुंभ | महा कुंभ - 2019-2027 FULL DETAIL

 

फिर क्या देवता पहुंच गए दानवों को मनाने के लिए और उन्होंने दानवो को पूरी वात बताई जिससे दानव खुशहोकर , samudr manthan k liy man jate h . ऐसा कहा जाता है मेरु पर सेस नाग को लपेट कर एक साइट दानव लगते है और एक साइट देवता और समुद्र मंथन शुरू होता है।

 

jisme bhut sari cheeze prakt hoti h . usi me se bish bhi niklata h , jise khud bhgwan shankar apne kanth pr dharan krte h . इसी प्रकार सबसे आखिरी में धनवंती अमृत का कलश लेकर निकलते जिसे पीने के लिए दानव उनके पीछे पढ़ जाते हैं। धनवंती उनसे बचने के लिए कलश लेकर भागते हैं। जिससे अमृत की बूंदे 4 जगह गिरती हैं। जंहा आज कुम्भ लगता है।

 

उज्जैन व हरिद्वार में अगला कुंभ का मेला कब लगेगा

 

ऐसा मना जा रहा है की 2016 m jo kumbh hua uske anusar ardh kubh 2022 m hona chiaye. lekin ग्रह मेल न होने का कारण। 

 

यह अर्ध कुम्भ शिप्रा नदी के तट पर 2021 में लग सकता है। पूर्ण कुम्भ 2027 में लगेगा.

 

महा -कुंभ | सिंहस्थ कुंभ | अर्ध कुंभ | विशाल कुंभ– 2019-2027 FULL DETAIL

 

दिव्य कुंभ विशाल कुंभ, महाकुंभ स्वर्णिम कुंभ आप चाहे जिस पावन शब्द के साथ इस शब्द का संगम करें।  कुंभ की परिभाषा एक ही होती है. सृष्टि पर मानवता का एकमात्र समागम बिन बुलाए दुनिया के हजारो लोग निर्मल जल में स्नान करने पाप मुक्त होने पहुंचते हैं। चाहे वह तीर्थों का राजा प्रयागराज  या हरिद्वार हो या नासिक हो या फिर उज्जैन और कुंभ का नजारा करीब-करीब एक सा रहता है। कुंभ तो 12 वर्ष में एक बार होता है फिर 4 तीर्थों पर कुंभ ऐसा क्यों।

जवाब है अमृत की पावन  बूंदें पृथ्वी लोक पर कुंभ की परंपरा कब से है इसकी सही तारीख योग को लेकर तमाम मिथ हैं।

600 ईसा पूर्व के बौद्ध लेखों में नदी मेलों के बारे में विवरण मिलता है और जानकार इसे कुंभ बताते हैं इतिहास में छठी सदी में राजा हर्षवर्धन के काल में कुंभ के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं।

प्राचीन भारत के हिंदू सम्राट राजा हर्षवर्धन का इतिहास पढ़ेंगे तो उसमें आपको हर 5 वर्ष में एक भव्य समारोह का जिक्र मिलेगा इतिहास बताता है कि प्रयागराज के कुंभ में राजा हर्षवर्धन अपना सब कुछ दान कर देते थे ,अपने सारे वस्त्र कुंभ में दान करके अपनी बहन के वस्त्र मांग कर पहनते थे और फिर जाते थे। इससे ज्ञात होता है कि कुंभ में दान का काफी महत्व है  और संगम नगरी में आज भी लोग ऐसा मानते हैं कि कुछ छूट जाए तो अफसोस ना करें यह समझे कि आपने वह वस्तु दान कर दी।

देश के 4 तीर्थ स्थल पर लगने वाले कुंभ में से प्रयागराज का कुंभ पृष्ठ माना जाता है इसलिए यहां कुंभ का आयोजन 12 वर्ष नहीं बल्कि 6 वर्ष में किया जाता है।

अर्ध कुंभ 6 वर्ष में और 12 वर्ष में पूर्ण कुंभ , माना जाता है प्रयागराज में अर्ध कुंभ की शुरुआत भी राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में हुई थी .देश के चार अलग-अलग तीर्थ स्थानों पर हर 6 वर्ष में लगने वाले कुंभ में सबसे ज्यादा प्रभावी माना जाता हैं। प्रयागराज के अर्ध कुंभ और महाकुंभ कुंभ , महाकुंभ का आयोजन 144 साल बाद होता है महाकुंभ को प्रयागराज में ही आयोजित किया जाता है।

मान्यता यह है कि महाकुंभ तब लगता है जब देवलोक में कुंभ का समय आता है। क्योंकि  देव लोक का 1 साल पृथ्वीलोक के 12 साल के बराबर है। देव लोक के 12 वर्ष पृथ्वीलोक के 144 वर्ष के बराबर होते है।

महाकुंभ सिर्फ सौभाग्यशालीओ के जीवन में पड़ता है 2013 में महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज में हुआ था धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक ऐसा कहा जाता है प्रयाग सृष्टि का केंद्र है। सृष्टि की रचना से पूर्व भगवान ब्रह्मा ने अश्वमेध यज्ञ कर दुनिया को बनाया था। इस कारण इसका नाम प्रयाग पड़ा  प्रा यानी कि प्रथम और  या यानी की यज्ञ संस्कृत में प्रयाग का अर्थ बलिदान भी होता है।

इसकी यह भी एक धार्मिक मान्यता है जिसके मुताबिक पावन भूमि पर सृष्टि की रचना के बाद भगवान ब्रह्मा ने यहीं पर पहला बलिदान दिया था  इस कारण भी इसे प्रयाग कहा जाता हैऔर इसी कारण संगम नगरी में दान को बेहद प्राथमिकता दी जाती है।

प्रयाग का कुंभ  अन्य 3 तीर्थ स्थानों के कुंभ से विशेष माना जाता है इसका एक अन्य कारण है सूर्य कुंभ को प्रकाश की ओर ले जाने वाला पर्व कहां जाता है प्रयागराज को प्रकाश वाह बुद्धिमता प्रतीक  सूर्य का उद्गम स्थल कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है प्रयाग में संगम पर जहां सूर्य का उदय होता है ब्रह्मांड का उद्गम स्थल है और पृथ्वी का भी केंद्र है वैसे संगम की पावन धरा को पूर्वजो की पूजा पाठ के लिए भी उत्तम माना जाता है। पूर्वजों को नमन का अच्छा माध्यम कहा जाता है कॉल संगम में स्नान कर  सूर्य को अर्घ देना माना जाता है कि सूर्य को अर्घ देने से  जहां पूर्वज प्रसन्न होते हैं तो वही इंसानी ज्ञान भी बढ़ता है प्रसन्न होते हैं आत्मिक सुख का अनुभव भी होता है।

 

कुंभ का वैज्ञानिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं से  अलग सूर्य ग्रह का वैज्ञानिक महत्व है विज्ञान के मुताबिक प्रात :काल सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर का चर्म रोगों से बचाव होता है। रक्त चाप सामान्य रहता है।

अक्सर लोग अंजलि से जल चढ़ाने की प्रक्रिया को भी आर्ग कहते हैं की जबकी अर्क दिया जाता है पात्र में  और अंजलि में भरकर जो जल छोड़ा जाता है  उसे सूर्य अर्घ्य नहीं सूर्य तर्पण कहा जाता है। इससे भी शरीर की तरह – तरह की बीमारियां खत्म होती हैं और शरीर का बीमारियों से भी बचाव होता है  कुंभ के दौरान  श्रद्धालुओं का हुजूम  इसे मेले का रूप देता है इसलिए कुंभ मेला कहा जाता है।

KUMBH KA MELA IN UJJAIN | सिंहस्थ कुंभ | अर्ध कुंभ | महा कुंभ - 2019-2027 FULL DETAIL

 

हर कुंभ मेले में विशेष महत्व और आकर्षण का केंद्र रहते हैं नागा साधु जिनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए करोड़ों श्रद्धालु दूर-दूर से आते 1000 संख्या में कुंभ में पहुंचने वाले नागा साधु किसी ना किसी अखाड़े से संबंध रखते हैं। अखाड़े से आम तौर पर अखाड़ा शब्द सुनने से लगता है। कुश्ती दंगल के प्रशिक्षण का केंद्र लेकिन कुंभ में अखाड़े हैं धर्म के वर्चस्व के लिए धर्म के प्रचार प्रसार की रक्षा के लिए। प्राचार्य ने चार पीठों की स्थापना  दक्षिण में श्रृंगेरी शंकराचार्य पीठ शंकराचार्य पीठ लकी जगन्नाथपुरी में गोवर्धन पीठ द्वारका में शारदा मठ बद्रिकाश्रम में ज्योति रिपीट इन चार पीठों के अंतर्गत हुआ 13 अखाड़ों का में जहां संतो ने शास्त्रों के साथ-साथ अस्त्र शस्त्रों का विज्ञान दिया।

मान्यता है कि सांसारिक सुखों को भोंकते हुए एक व्यक्ति धर्म की रक्षा नहीं कर सकता साधु जीवन चलने वाला व्यक्ति जब साधु बनता है तो उसके बारे में पुख्ता छानबीन कर उसे अखाड़े में शामिल किया जाता है 12 वर्ष लगते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा को पास करने में इसके बाद 5 गुरुओं की दिशा निर्देश में ब्रम्चारी बनता है महापुरुष।

नागा बनने के लिए महापुरुष खुद करते हैं अपना पिंड दान कुंभ में वैसे तो लाखों साधु संतों का हुजूम उमड़ता है जिसमें केवल 13 अखाड़े भाग लेते हैं जो किन्नर अखाड़ा जुड़ने के बाद अब हो गए हैं 14 .

प्रारंभ होने से लेकर समापन तिथि तक कुंभ में ही निवास करते हैं झांकियों के साथ सभी साधु संत अपने आंकड़े के साथ कुंभ में पधारते हैं झांकियों को अखाड़ों की पेशवाई कहा जाता है।

सभी अखाड़े अपने अपने आंकड़ों की पेशवाई में अपने अपने इष्ट की पूजा करते हुए आंकड़ों में प्रवेश करते हैं शाही स्नान के बाद कुंभ की शुरुआत होती है लेकिन शाही स्नान पर भी सामान्य श्रद्धालुओं से पहले साधु संत स्नान करते हैं। इसके लिए सभी साधु संतों की सहमति से सभी आंकड़ों का अलग-अलग टाइम निर्धारित किया जाता है स्नान के दिन प्रातः काल 3:00 या 4:00 बजे से सभी साधु अपने-अपने स्नान की तैयारी में जुट जाते हैं कहां जाता है शाही स्नान के बीच साधू स्नान में कई बार खूनी संघर्ष भी हुए हैं जिसे देखते हुए अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा सभी आंकड़ों के अलग-अलग टाइम निर्धारित कर दिए गए थे।

जो आज तक चल रहा है यह चैनल आज तक चल रहा है साधु संतों के शाही स्नान को देखने के लिए उनकी भव्य डोलियों के साथ लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है संतो को नमन करते हैं उनकी चरण धूलि हैं और साधु संत हर हर महादेव कहते हुए और शाही स्नान के लिए जाते हैं स्नान के बाद साधु संत अपने अपने कार्य की प्रीति लिए अपने अपने आखाड़ो में वापस पहुंच जाते हैं।

इसके बाद सामान्य लोग स्नान करते हैं साल 2016 में अस्तित्व में आया एक किन्नर अखाड़ा पहली बार उज्जैन कुंभ में भाग लिया 2019 में प्रयागराज। किन्नर अखाड़ा भी अपनी पेशवाई के लिए जाने जाने लगा है। किन्नरों का कुंभ में एक अलग ही रूप देखने को मिलता है किन्नरों को मिलने वाले आदर भाव को देख दिमाग में एक ही प्रश्न बार-बार उठता है सत्कार के बाद भी उन्हें समाज परिष्कृत नजरों से क्यों देखता है।

किन्नर अखाड़ा ना सिर्फ मेला में भाग लेकर बल्कि अखाड़े के माध्यम से सबको बताता कि वह भी किस प्रकार सही है और लोगों के भ्रम हटाता है। कुंभ के समय प्रयागराज मानो स्वर्ग का एहसास कराता है हर हर महादेव ढोल मंजीरे सुबह-शाम अपने-अपने अखाड़ों की आरती।

कुंभ के इन पवित्र शहरों से प्रयागराज गुंजायमान होता है और मन को सुकून देती है भव्य गंगा आरती श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। हर दिन की गंगा आरती एक अलग अनुभूति कराती है। इन धर्म शोरों के बीच प्रयागराज वास्तव में एक अलग सा प्रतीत होता है आस्था के इस संगम में श्रद्धालुओं का वह हुजूम देखने को मिलता है जो शायद ही कहीं और मिले। आस्था और संगम का ऐसा मेला जिसे देख अंग्रेज भी दांतों तले उंगलियां दबा बैठे थे।

साल 1942 में जब प्रयागराज में कुंभ मेला आयोजित हुआ तो भारत के वायसराय लॉर्ड गवर्नर जनरल ने भी मदन मोहन मालवीय के साथ तट पर पहुंचे। यंहा उन्होंने अलग-अलग वेशभूषा वाले लाखों लोगों को त्रिवेणी में डुबकी लगाते देखा पूजा आराधना करते देखा तो दंग रह गए मालवीय जी से बोले से 10 तारीख पर तय स्थान पर तय समय पर इतने सारे लोग इक्कठा कैसे हो जाते हैं इतनी लाखों लोगों के पास आप संदेश कैसे भेजते हैं आपके पास तो कोई प्रतिष्ठित संचार व्यवस्था भी नहीं है और इसके प्रचार में कितना खर्च आता होगा कैसे होता होगा यह सब मदन मोहन मालवीय जी बोले केवल दो आने।

वायसराय बोले थोड़ा चौक कर केवल दो आने ने यह कैसे संभव है मालवीय जी ने अपनी जेब से पंचांग निकाला और बोले यह पंचांग दो आने में छपता है इसमें हिंदू पर्व की तिथियां दर्ज होती हैं बस यही भूमध्य में जो लाखों श्रद्धालुओं को एक जगह पर ले आता है यह भी नहीं है।

साहब धर्म और आस्था रखने वाले लोगों का अनूठा संगम है यहाँ किसी सरकारी प्रचार या बुलावे की जरूरत नहीं पड़ती मालवीय जी की बात सुनकर वायसराय भी कुंभ की आस्था के सामने नतमस्तक हो गए।

मान्यता है कि अमृत कलश स्वर्ग तक सुरक्षित पहुंचने में सूर्य चंद्र एवं बृहस्पति की अहम भूमिका रही। लेकिन इस दौरान भी अमृत की बूंदें जिन चार जगहों पर गिरी हिंदू पंचांग के अनुसार तारों का वैसा ही संगम और रहता है। तारों की चाल पहले जैसी थी जब कलर्स की बूंदे यहां पड़ी थी

कुंभ में श्रद्धा की अनूठी तस्वीरें किसी के भी मन में सवाल पैदा कर सकती हैं और यह सवाल उठना लाजमी है कैसे कुंभ की शुरुआत हुई। तो जवाब हमने आपको पहले ही दिया कि धर्म की रक्षा के लिए कुंभ की शुरुआत हुई धर्म के रक्षकों के रूप में साधु संत हुए यह सिर्फ धार्मिक मान्यताएं हैं पौराणिक महत्व ऐसा भी नहीं है अधिकतर धार्मिक मान्यताओं के पीछे वैज्ञानिक आधार भी छुपे हैं। कुंभ के पीछे भी लाखों करोड़ों की भीड़ और चारों तरफ बस हर हर महादेव की गूंज मानो पूरा ब्रह्मांड हर हर महादेव पुकार रहा हो।

कोई तो अलौकिक शक्ति है जो इतनी आवाम को एक दिशा में उमड़ने के लिए मजबूर करती है वैसे भारतीय आस्था वैज्ञानिक कसौटियों पर भी खरी उतरती है।

वेद पुराणों और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक संगम पर कल भास्कर के दौरान अस्थाई निवास करने वाले कल वासी पाए जाते हैं मान्यताओं के मुताबिक स्नान करने जो समय चुना गया है संगम पर इस समय नदियों का पानी काफी ठंडा रहता है जाहिर है तापमान कम हो तो रोग पनपने जीवाणु कम पानी में उत्पन्न हो पाते हैं.

 

UJJAIN KUMB SAHI SNAN DATE IN HINDI

 

पवित्र स्नानतिथि               दिनांक
शाही स्नानचैत्र शुक्ल 15
पंचेशानी यात्रावैशाख कृष्ण  09- वैशाख कृष्ण 30
व्रत पर्व वरुठिनी एकादशी      वैशाख कृष्ण 11
वैशाख कृष्ण अमावस्यावैशाख कृष्ण 30
अक्षय तृतीया
शंकराचार्य जयंती     वैशाख शुक्ल 05
वृषभ संक्रांतिवैशाख शुक्ल 09
मोहिनी एकादशीवैशाख शुक्ल 11
प्रदोष वैशाख शुक्ल 13
नृसिंह जयंतीवैशाख शुक्ल 14
न्रमुख शाही स्नान
वैशाख शुक्ल 15

 



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